राजनीति के चक्रव्यूह में फँसा देश: अफ़ग़ानिस्तान – एक आधुनिक अध्ययन 📚 Topic Guide

From Shiksha Setu • Last Updated: February 10, 2026
संकेतक (Indicator)विवरण / आँकड़े
देश का पूरा नामअफ़ग़ानिस्तान इस्लामी अमीरात (Islamic Emirate of Afghanistan)
राजधानीकाबुल
कुल जनसंख्या~4.3 – 4.5 करोड़ (अनुमानित, उच्च वृद्धि दर)
जनसंख्या वृद्धि दर~2.3% वार्षिक
शहरीकरण (Urbanization)~26.3% (अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण है)
मुद्रा (Currency)अफ़ग़ानी (AFN) [1 USD ≈ 70-75 AFN अस्थिर]
राजभाषाएँपश्तो और दारी (फ़ारसी)

एक रणनीतिक रूप से जटिल देश अफ़ग़ानिस्तान

अफ़ग़ानिस्तान, ‘साम्राज्यों का कब्रिस्तान’ , अपने दुर्गम भूगोल, गहन जनजातीय-सामाजिक संरचना और रणनीतिक स्थान के कारण शताब्दियों से विश्व राजनीति का केंद्र रहा है। 2021 में तालिबान की वापसी ने देश को एक इस्लामी अमीरात में बदल दिया है, जिससे एक गंभीर मानवीय संकट उत्पन्न हुआ है। वर्तमान सरकार को अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त नहीं है और देश वैश्विक अलगाव, आर्थिक संकट और मानवाधिकारों के हनन की चुनौतियों का सामना कर रहा है। यह रिपोर्ट इस जटिल परिदृश्य का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करती है।

भूगोल और प्राकृतिक संरचना – चट्टानी दुर्ग और रणनीतिक चौराहा

अफ़ग़ानिस्तान का भूगोल केवल पहाड़ों और रेगिस्तानों का विवरण नहीं है; यह वहाँ के इतिहास, राजनीति और लोगों के कठिन जीवन का भाग्य-विधाता है। यह एक ऐसा देश है जिसकी प्राकृतिक संरचना ने बाहरी आक्रमणकारियों के लिए इसे जीतना मुश्किल और शासन करना लगभग असंभव बना दिया है।

एक आधुनिक अध्ययन के परिप्रेक्ष्य में, अफ़ग़ानिस्तान के भूगोल को तीन मुख्य लेंसों के माध्यम से देखा जाना चाहिए: इसकी भूपरिवेष्ठित (landlocked) स्थिति, इसकी पर्वतीय रीढ़ (Hindu Kush), और इसके尚未दोहित (untapped) खनिज संसाधन।

1. रणनीतिक स्थिति: ‘एशिया का हृदय’

अफ़ग़ानिस्तान पूरी तरह से भूपरिवेष्ठित (Landlocked) देश है, जिसका कोई समुद्र तट नहीं है। यह मध्य एशिया, दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) के चौराहे पर स्थित है।

  • सीमाएँ: इसकी सीमाएँ 6 देशों से मिलती हैं:
    • उत्तर: तुर्कमेनिस्तान, उज़बेकिस्तान और ताजिकिस्तान।
    • पूर्व और दक्षिण: पाकिस्तान (सबसे लंबी सीमा, डूरंड रेखा)।
    • पश्चिम: ईरान।
    • उत्तर-पूर्व (सुदूर): चीन (वाखान कॉरिडोर के माध्यम से एक छोटी लेकिन रणनीतिक सीमा)।

यह स्थिति इसे ऐतिहासिक रूप से “सिल्क रोड” का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती थी, लेकिन आधुनिक समय में, यह इसे अपने पड़ोसियों (विशेषकर पाकिस्तान और ईरान) पर व्यापार और पारगमन के लिए अत्यधिक निर्भर बनाता है।

2. भौतिक विभाजन: प्रकृति के तीन चेहरे

अफ़ग़ानिस्तान का भूभाग अत्यधिक विषम है, जिसे मोटे तौर पर तीन प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है:

क. मध्य उच्चभूमि (Central Highlands) – देश की रीढ़

यह अफ़ग़ानिस्तान का सबसे प्रमुख भौतिक लक्षण है। देश का लगभग दो-तिहाई हिस्सा ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों से ढका है।

  • हिंदू कुश पर्वतमाला: यह हिमालय का पश्चिमी विस्तार है और देश के केंद्र से होकर गुजरती है। यह न केवल एक भौतिक बाधा है, बल्कि एक सांस्कृतिक विभाजक भी है, जो उत्तर को दक्षिण से अलग करता है।
  • भूभाग: यहाँ गहरी घाटियाँ, संकरे दर्रे (जैसे प्रसिद्ध सालंग दर्रा) और ऊँची चोटियाँ हैं। यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से स्थानीय सरदारों और विद्रोही समूहों के लिए सुरक्षित पनाहगाह रहा है क्योंकि यहाँ बड़ी सेनाओं का संचालन करना बेहद कठिन है।

ख. उत्तरी मैदान (Northern Plains)

हिंदू कुश के उत्तर में स्थित यह क्षेत्र मध्य एशिया के स्टेप्स (steppes) का विस्तार है।

  • यह क्षेत्र अपेक्षाकृत समतल है और इसमें उपजाऊ भूमि के कुछ हिस्से हैं।
  • अमु दरिया नदी यहाँ की उत्तरी सीमा बनाती है। यह क्षेत्र कृषि और गैस संसाधनों के लिए महत्वपूर्ण है।

ग. दक्षिण-पश्चिमी पठार और रेगिस्तान (Southwestern Plateau and Deserts)

हिंदू कुश के दक्षिण और पश्चिम में भूमि धीरे-धीरे रेगिस्तानी पठारों में बदल जाती है।

  • यह क्षेत्र अत्यंत शुष्क है। यहाँ ‘रेगिस्तान’ (रेतीला रेगिस्तान) और ‘दश्त-ए-मार्गो’ (मृत्यु का रेगिस्तान – पथरीला रेगिस्तान) स्थित हैं।
  • हेलमंद नदी इस क्षेत्र की जीवन रेखा है, जो कृषि (और अफीम की खेती) के लिए महत्वपूर्ण सिंचाई प्रदान करती है।

3. जल निकासी प्रणाली: प्यासी भूमि की जीवन रेखाएँ

अफ़ग़ानिस्तान की नदियाँ बर्फ पिघलने से बनती हैं और देश के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसकी अधिकांश नदी प्रणालियाँ अंतर्देशीय (Endorheic) हैं, जिसका अर्थ है कि वे समुद्र तक नहीं पहुँचती हैं, बल्कि अंतर्देशीय झीलों में गिरती हैं या रेगिस्तान में सूख जाती हैं।

  • अमु दरिया (ऑक्सस): उत्तर में मध्य एशिया के साथ सीमा बनाती है। यह एक विशाल नदी है लेकिन इसका उपयोग सिंचाई के लिए पूरी तरह से नहीं हो पाया है।
  • हेलमंद नदी: यह देश की सबसे लंबी नदी है। यह मध्य पहाड़ों से निकलती है और दक्षिण-पश्चिम में ईरान की सीमा के पास हमून-ए-हेलमंद झीलों में जाकर समाप्त होती है। यह दक्षिणी कृषि क्षेत्र की रीढ़ है।
  • काबुल नदी: यह एकमात्र प्रमुख नदी है जो पूर्व की ओर बहती है, पाकिस्तान में प्रवेश करती है और अंततः सिंधु नदी में मिल जाती है। यह काबुल और जलालाबाद की घाटियों को उपजाऊ बनाती है।

जल संकट: आधुनिक समय में, जलवायु परिवर्तन और खराब जल प्रबंधन के कारण अफ़ग़ानिस्तान गंभीर सूखे का सामना कर रहा है, जिससे इन नदियों पर निर्भरता और बढ़ गई है और पड़ोसी देशों (विशेषकर ईरान के साथ हेलमंद के पानी को लेकर) के साथ तनाव बढ़ गया है।

4. जलवायु: चरम सीमाओं का देश

अफ़ग़ानिस्तान की जलवायु कठोर महाद्वीपीय (Harsh Continental) है।

  • तापमान में भारी अंतर: यहाँ गर्मियाँ बेहद गर्म (दक्षिण में तापमान 50°C तक) और सर्दियाँ कड़ाके की ठंड वाली (पहाड़ों में तापमान -20°C से नीचे) होती हैं।
  • वर्षा: अधिकांश देश शुष्क या अर्ध-शुष्क है। वर्षा मुख्य रूप से सर्दियों और वसंत ऋतु में होती है, और वह भी अनियमित। यह देश को बार-बार पड़ने वाले सूखे के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाता है।

5. प्राकृतिक संसाधन: ‘संसाधन का अभिशाप’

आधुनिक भू-राजनीतिक अध्ययन में यह पहलू सबसे महत्वपूर्ण है। अफ़ग़ानिस्तान, जो दुनिया के सबसे गरीब देशों में से एक है, संभावित रूप से दुनिया के सबसे अमीर खनिज भंडारों में से एक पर बैठा है।

  • खनिज संपदा: अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षणों का अनुमान है कि अफ़ग़ानिस्तान में 1 ट्रिलियन डॉलर (या उससे अधिक) मूल्य के खनिज भंडार हैं।
  • प्रमुख संसाधन:
    • लिथियम और कोबाल्ट: आधुनिक बैटरी तकनीक और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए महत्वपूर्ण। इसे “नया तेल” कहा जा रहा है और चीन जैसे देशों की नज़र इस पर है।
    • तांबा और लौह अयस्क: विशाल भंडार मौजूद हैं (जैसे ऐनक तांबे की खदान)।
    • दुर्लभ मृदा तत्व (Rare Earth Elements): उच्च तकनीक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए महत्वपूर्ण।
    • रत्न: पन्ना, माणिक और लैपिस लाजुली (लाजवर्द) ऐतिहासिक रूप से प्रसिद्ध हैं।

साम्राज्यों का कब्रिस्तान” और “एशिया का चौराहा”

अफ़ग़ानिस्तान: एक ऐतिहासिक समयरेखा (Detailed Historical Timeline)

अफ़ग़ानिस्तान का इतिहास निरंतर विदेशी आक्रमणों, आंतरिक कबीलाई संघर्षों और अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के भयंकर प्रतिरोध की कहानी है। इसकी रणनीतिक स्थिति ने इसे हमेशा महाशक्तियों के आकर्षण का केंद्र बनाए रखा।

1. प्राचीन काल: सभ्यताओं का मिलन स्थल (लगभग 3000 ईसा पूर्व – 650 ईस्वी)

इस काल में अफ़ग़ानिस्तान कोई एक राजनीतिक इकाई नहीं था, बल्कि विभिन्न साम्राज्यों और संस्कृतियों का हिस्सा था।

  • सिंधु घाटी सभ्यता संबंध: अफ़ग़ानिस्तान के कुछ हिस्से (जैसे मुंडीगाक) सिंधु घाटी सभ्यता के व्यापार नेटवर्क से जुड़े थे।
  • आर्यों का आगमन: यह क्षेत्र प्रारंभिक इंडो-ईरानी (आर्यन) लोगों के प्रवास का एक प्रमुख मार्ग था। यहाँ पारसी धर्म (ज़ोरोस्ट्रियनवाद) के शुरुआती रूप विकसित हुए।
  • फ़ारसी साम्राज्य (अखेमेनिद): छठी शताब्दी ईसा पूर्व में, यह महान फ़ारसी साम्राज्य का हिस्सा बन गया।
  • सिकंदर महान का आक्रमण (330 ईसा पूर्व): सिकंदर ने फ़ारसी साम्राज्य को हराते हुए इस क्षेत्र को जीता। उसने कई शहर बसाए (जैसे हेरात और कंधार के पूर्ववर्ती रूप) और यूनानी (हेलेनिस्टिक) संस्कृति की शुरुआत की।
  • मौर्य साम्राज्य और बौद्ध धर्म: सिकंदर के बाद, चंद्रगुप्त मौर्य ने दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों पर नियंत्रण किया। अशोक के शासनकाल में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रसार हुआ, विशेषकर बामियान और गांधार क्षेत्रों में।
  • कुषाण साम्राज्य (पहली-तीसरी शताब्दी ईस्वी): यह अफ़ग़ानिस्तान का स्वर्ण युग था। कुषाणों ने सिल्क रोड के व्यापार को नियंत्रित किया और गांधार कला (यूनानी-बौद्ध कला का मिश्रण) अपने चरम पर पहुँची।

2. इस्लामी विजय और मध्ययुगीन काल (650 ईस्वी – 1747 ईस्वी)

  • इस्लाम का आगमन: 7वीं शताब्दी के मध्य में अरबों ने पश्चिमी अफ़ग़ानिस्तान में प्रवेश किया, लेकिन पूरे क्षेत्र का इस्लामीकरण होने में कई सदियाँ लग गईं।
  • स्थानीय साम्राज्य (गज़नवी और गोरी): 10वीं-12वीं शताब्दी में ग़ज़नी और गोर (मध्य अफ़ग़ानिस्तान) में स्थानीय इस्लामी राजवंशों का उदय हुआ। महमूद गज़नवी और मुहम्मद गोरी ने यहाँ से भारत पर अपने प्रसिद्ध आक्रमण शुरू किए।
  • मंगोल आक्रमण (1219 ईस्वी): चंगेज़ खान के नेतृत्व में मंगोलों ने क्षेत्र को बुरी तरह तबाह कर दिया। कई प्राचीन शहर और सिंचाई प्रणालियाँ नष्ट कर दी गईं।
  • तैमूरी पुनर्जागरण: तैमूर लंग के वंशजों ने 15वीं शताब्दी में हेरात को अपनी राजधानी बनाया, जो कला, साहित्य और संस्कृति का एक महान केंद्र बन गया।
  • मुगल-सफ़ावी प्रतिद्वंद्विता (16वीं-18वीं सदी): इस दौर में अफ़ग़ानिस्तान का पूर्वी भाग भारत के मुगलों (काबुल, कंधार) और पश्चिमी भाग ईरान के सफ़ावियों (हेरात) के बीच बँटा रहा।

3. आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान का जन्म (दुर्रानी साम्राज्य) (1747 – 1826)

यह अफ़ग़ानिस्तान के इतिहास का सबसे निर्णायक मोड़ था।

  • अहमद शाह अब्दाली (दुर्रानी): 1747 में, नादिर शाह की मृत्यु के बाद, एक पश्तून सैन्य कमांडर अहमद शाह अब्दाली को कबीलों ने अपना नेता चुना। उन्होंने विभाजित पश्तून कबीलों को एकजुट किया और आधुनिक अफ़ग़ान राज्य की नींव रखी। उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ (अहमद शाह बाबा) माना जाता है।
  • साम्राज्य का विस्तार: उनके साम्राज्य का विस्तार मशहद (ईरान) से लेकर कश्मीर और दिल्ली तक था। पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761) में उन्होंने मराठों को हराया।
  • राजधानी का स्थानांतरण: उनके बेटे तैमूर शाह ने राजधानी को कंधार से काबुल स्थानांतरित कर दिया।

4. ‘द ग्रेट गेम’ और बफर स्टेट का दौर (1826 – 1919)

19वीं सदी में अफ़ग़ानिस्तान दो विस्तारवादी साम्राज्यों—उत्तर में ज़ारवादी रूस और दक्षिण में ब्रिटिश भारत—के बीच फँस गया। इसे ‘द ग्रेट गेम’ कहा गया।

  • दोस्त मोहम्मद खान: बारकज़ई वंश की स्थापना की और बिखरते दुर्रानी साम्राज्य को फिर से जोड़ने की कोशिश की।
  • प्रथम आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध (1839-1842): अंग्रेजों ने अफ़ग़ानिस्तान में एक कठपुतली शासक बैठाने की कोशिश की। यह अंग्रेजों के लिए एक विनाशकारी हार थी; उनकी पूरी सेना काबुल से लौटते समय मारी गई।
  • द्वितीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध (1878-1880): अंग्रेजों ने दोबारा आक्रमण किया। इस बार वे अफ़ग़ानिस्तान की विदेश नीति पर नियंत्रण स्थापित करने में सफल रहे, जबकि आंतरिक स्वायत्तता बनी रही।
  • डूरंड रेखा (1893): अमीर अब्दुर्रहमान खान (“लौह अमीर”) के शासनकाल में, अंग्रेजों ने अफ़ग़ानिस्तान और ब्रिटिश भारत के बीच सीमा खींची, जिसे डूरंड रेखा कहा जाता है। इसने पश्तूनों को दो देशों में बाँट दिया और यह आज भी विवाद का कारण है।
  • तृतीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध और स्वतंत्रता (1919): अमीर अमानुल्लाह खान ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ा। यद्यपि सैन्य रूप से अनिर्णायक, रावलपिंडी की संधि (1919) ने अफ़ग़ानिस्तान को अपनी विदेश नीति पर पूर्ण नियंत्रण वापस दिलाया।

5. आधुनिकीकरण के प्रयास और राजशाही का अंत (1919 – 1978)

  • अमानुल्लाह खान के सुधार (1919-1929): स्वतंत्रता के बाद, अमानुल्लाह ने तुर्की की तर्ज पर तेज़ी से पश्चिमीकरण और सामाजिक सुधारों (जैसे परदा हटाने) का प्रयास किया। रूढ़िवादी कबीलों और मौलवियों ने विद्रोह कर दिया और उन्हें गद्दी छोड़नी पड़ी।
  • नादिर शाह और ज़ाहिर शाह (मुसाहिबान वंश): संक्षिप्त अराजकता के बाद, नादिर शाह ने व्यवस्था बहाल की। उनकी हत्या के बाद, उनके बेटे मोहम्मद ज़ाहिर शाह (1933-1973) राजा बने।
  • शांति का दशक: ज़ाहिर शाह का 40 साल का शासन अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण था। 1960 के दशक (“लोकतंत्र का दशक”) में एक नया संविधान बना और सीमित लोकतांत्रिक चुनाव हुए।
  • दाऊद खान का तख्तापलट (1973): ज़ाहिर शाह के चचेरे भाई और पूर्व प्रधानमंत्री मोहम्मद दाऊद खान ने राजशाही को खत्म कर दिया और खुद को पहले राष्ट्रपति के रूप में स्थापित किया। अफ़ग़ानिस्तान एक गणराज्य बन गया।

6. कम्युनिस्ट क्रांति, सोवियत आक्रमण और गृहयुद्ध (1978 – 1996)

यह अफ़ग़ानिस्तान के आधुनिक त्रासदी की शुरुआत थी।

  • सौर क्रांति (1978): अफ़ग़ान कम्युनिस्ट पार्टी (PDPA) ने दाऊद खान की हत्या कर सत्ता संभाली। उनके कट्टरपंथी भूमि और सामाजिक सुधारों ने देशव्यापी इस्लामी विद्रोह को जन्म दिया।
  • सोवियत आक्रमण (दिसंबर 1979): लड़खड़ाती कम्युनिस्ट सरकार को बचाने के लिए सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया।
  • मुजाहिदीन प्रतिरोध (1980-1989): अमेरिका, पाकिस्तान, सऊदी अरब और चीन ने सोवियतों से लड़ने के लिए इस्लामी प्रतिरोध सेनानियों (मुजाहिदीन) को हथियार और पैसा दिया। 10 साल के खूनी संघर्ष के बाद, सोवियत संघ 1989 में हारकर वापस चला गया।
  • क्रूर गृहयुद्ध (1992-1996): सोवियत समर्थक सरकार 1992 में गिर गई। इसके बाद मुजाहिदीन के विभिन्न गुट सत्ता के लिए आपस में ही भिड़ गए। काबुल को मलबे में बदल दिया गया और देश अराजकता में डूब गया।

7. तालिबान का उदय और अमेरिकी हस्तक्षेप (1996 – 2021)

  • तालिबान शासन (1996-2001): गृहयुद्ध की अराजकता से निराश मदरसे के छात्रों (तालिबान) का एक समूह मुल्ला उमर के नेतृत्व में उभरा। पाकिस्तान के समर्थन से, उन्होंने 1996 में काबुल पर कब्ज़ा कर लिया। उन्होंने शांति तो स्थापित की, लेकिन शरिया की अत्यंत कठोर व्याख्या लागू की और अल-कायदा को पनाह दी।
  • 9/11 और अमेरिकी आक्रमण (2001): अमेरिका में 9/11 के हमलों के बाद, जब तालिबान ने ओसामा बिन लादेन को सौंपने से इनकार कर दिया, तो अमेरिका ने आक्रमण किया और तालिबान शासन को उखाड़ फेंका।
  • इस्लामिक रिपब्लिक और विद्रोह (2001-2021): बॉन समझौते के तहत हामिद करज़ई के नेतृत्व में एक नई लोकतांत्रिक सरकार स्थापित की गई। अमेरिका और नाटो ने राष्ट्र-निर्माण में अरबों डॉलर खर्च किए। हालाँकि, भ्रष्टाचार, अक्षमता और पाकिस्तान में सुरक्षित पनाहगाहों के कारण तालिबान ने एक खूनी विद्रोह शुरू कर दिया, जो दो दशकों तक चला।

8. वर्तमान स्थिति: चक्र पूरा हुआ (2021 – अब तक)

  • तालिबान की वापसी (अगस्त 2021): जैसे ही अमेरिका ने अपनी सेना वापस बुलाने की प्रक्रिया पूरी की, अफ़ग़ान राष्ट्रीय सेना ढह गई। 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने काबुल पर दोबारा कब्ज़ा कर लिया, और देश फिर से उसी अनिश्चितता के दौर में पहुँच गया जहाँ से 20 साल पहले यात्रा शुरू हुई थी।

वर्तमान राजनीतिक ढाँचा, शासन एवं चुनौतियाँ

वर्तमान राजनीतिक ढाँचा, शासन एवं चुनौतियाँ

तालिबान 2.0 का शासन ढाँचा आधुनिक दुनिया के किसी भी मानक लोकतांत्रिक मॉडल से मेल नहीं खाता। यह एक धर्मतंत्र (Theocracy) है, जहाँ सत्ता का स्रोत संविधान या जनता का वोट नहीं, बल्कि धार्मिक नेता (अमीर) और शरिया कानून की उनकी व्याख्या है।

1. राजनीतिक पदानुक्रम: दोहरी शक्ति संरचना

वर्तमान अफ़ग़ानिस्तान में शक्ति के दो केंद्र हैं: कंधार (वैचारिक और वास्तविक शक्ति) और काबुल (प्रशासनिक शक्ति)।

क. सर्वोच्च नेता (Amir-ul-Momineen) – सत्ता का केंद्र

  • हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा: यह अफ़ग़ानिस्तान के सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक नेता हैं। वे काबुल में नहीं, बल्कि तालिबान के आध्यात्मिक जन्मस्थान कंधार में रहते हैं।
  • शक्ति: उनके पास अंतिम वीटो शक्ति है। सरकार की नियुक्तियाँ, विदेश नीति, और सामाजिक कानून (जैसे महिलाओं पर प्रतिबंध) सीधे उनके आदेश (फ़रमान) से आते हैं। वे एकांत में रहते हैं और सार्वजनिक रूप से बहुत कम दिखाई देते हैं।

ख. रहबरी शूरा (नेतृत्व परिषद)

  • यह कंधार स्थित वरिष्ठ मौलवियों और कबीलाई नेताओं की एक परिषद है जो सर्वोच्च नेता को सलाह देती है। वास्तव में, यह समूह काबुल स्थित कैबिनेट से अधिक शक्तिशाली है क्योंकि यह वैचारिक दिशा तय करता है।

ग. कार्यवाहक सरकार (काबुल प्रशासन)

  • प्रधानमंत्री (रईस-उल-वज़ारा): मुल्ला हसन अखुंद। उनका काम सर्वोच्च नेता के आदेशों को लागू करना और मंत्रालयों का समन्वय करना है।
  • मंत्रिमंडल: इसमें रक्षा, गृह और विदेश मंत्रालय शामिल हैं। ये मंत्री दैनिक प्रशासन चलाते हैं, लेकिन वे नीति नहीं बनाते। उदाहरण के लिए, काबुल के कई मंत्री लड़कियों के स्कूलों को खोलने के पक्ष में थे, लेकिन कंधार के आदेश के कारण वे ऐसा नहीं कर सके।

2. शासन प्रणाली (Governance Model)

तालिबान का शासन मॉडल ‘केंद्रीकृत निरंकुशता’ पर आधारित है।

  • संविधान का अभाव: देश में कोई औपचारिक संविधान नहीं है। शासन का आधार कुरान, सुन्नत और हनफ़ी न्यायशास्त्र (Fiqh) है। पूर्ववर्ती लोकतांत्रिक संविधान को रद्द कर दिया गया है।
  • न्यायपालिका: न्याय प्रणाली पूरी तरह से मदरसों से निकले मौलवियों (काज़ियों) के हाथ में है। नागरिक कानूनों की जगह शरिया अदालतों ने ले ली है। सार्वजनिक दंड (कोड़े मारना, पत्थर मारना) फिर से शुरू हो गए हैं।
  • पुण्य का प्रचार और बुराई की रोकथाम मंत्रालय (Ministry of Vice and Virtue): यह वर्तमान शासन का सबसे शक्तिशाली और भयभीत करने वाला अंग है। यह ‘नैतिक पुलिस’ के रूप में कार्य करता है, जो नागरिकों के पहनावे, दाढ़ी, नमाज़ और महिलाओं की आवाजाही की निगरानी करता है।

3. प्रमुख आंतरिक राजनीतिक चुनौतियाँ

बाहरी दुनिया को तालिबान एक एकजुट इकाई लग सकता है, लेकिन सतह के नीचे गंभीर दरारें और चुनौतियाँ मौजूद हैं।

क. आंतरिक गुटबाजी: कंधार बनाम काबुल

तालिबान के भीतर दो मुख्य गुटों के बीच एक शीत युद्ध चल रहा है:

  • कंधारी गुट (वैचारिक): हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा के नेतृत्व में। ये अत्यंत रूढ़िवादी हैं और अंतरराष्ट्रीय मान्यता की परवाह किए बिना ‘शुद्ध इस्लामी समाज’ बनाने पर जोर देते हैं। वर्तमान में इनका पलड़ा भारी है।
  • हक्कानी नेटवर्क और व्यावहारिक गुट: सिराजुद्दीन हक्कानी (गृह मंत्री) और मुल्ला याकूब (रक्षा मंत्री) के नेतृत्व में। ये थोड़े अधिक व्यावहारिक (Pragmatic) माने जाते हैं। ये अंतरराष्ट्रीय मान्यता, आर्थिक सहायता और एक कार्यशील सेना चाहते हैं। वे कठोर सामाजिक प्रतिबंधों को शासन के लिए बाधा मानते हैं, लेकिन वे खुले तौर पर अमीर को चुनौती नहीं दे सकते।

ख. समावेशिता का अभाव (Inclusivity Crisis)

  • सरकार लगभग पूरी तरह से पश्तून पुरुषों से बनी है।
  • ताजिक, उज़बेक और हज़ारा (शिया) समुदायों को सत्ता के ढांचे से व्यवस्थित रूप से बाहर रखा गया है। यह दीर्घकालिक गृहयुद्ध या जातीय तनाव का कारण बन सकता है।

ग. प्रशासनिक क्षमता की कमी (Brain Drain)

  • 2021 में बड़ी संख्या में शिक्षित अफ़ग़ान (इंजीनियर, डॉक्टर, नौकरशाह) देश छोड़कर भाग गए। तालिबान ने अपने वफादार मदरसे के छात्रों को प्रशासनिक पदों पर बैठा दिया है, जिनके पास आधुनिक राज्य चलाने का कोई अनुभव नहीं है। इससे बुनियादी सेवाएँ (बिजली, पानी, बैंकिंग) चरमरा रही हैं।

4. सुरक्षा चुनौतियाँ: ISKP का खतरा

तालिबान के लिए सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अब वे ‘विद्रोही’ नहीं बल्कि ‘सरकार’ हैं, और उन्हें एक दूसरे विद्रोही समूह का सामना करना पड़ रहा है।

  • इस्लामिक स्टेट – खुरासान प्रोविंस (ISKP): यह तालिबान का कट्टर दुश्मन है। ISKP का मानना है कि तालिबान बहुत ‘राष्ट्रवादी’ हो गया है और उसने अमेरिका के साथ दोहा समझौता करके जिहाद से गद्दारी की है।
  • ISKP शिया मस्जिदों, सिखों और यहाँ तक कि तालिबान के अधिकारियों और मंत्रालयों पर आत्मघाती हमले कर रहा है। यह तालिबान के उस दावे को कमजोर करता है कि उन्होंने देश में ‘पूर्ण सुरक्षा’ स्थापित कर दी है।

5. अफ़ग़ानिस्तान गणराज्य (2021 से पहले) बनाम तालिबान अमीरात (वर्तमान)

समझने में आसानी के लिए एक तुलनात्मक तालिका:

विशेषताइस्लामिक रिपब्लिक (2001-2021)इस्लामिक अमीरात (2021-अब तक)
राज्य का स्वरूपसंवैधानिक लोकतंत्रइस्लामी धर्मतंत्र (Theocracy)
सत्ता का स्रोतचुनाव और संविधानसर्वोच्च नेता (अमीर) और शरिया
नेतृत्वराष्ट्रपति (निर्वाचित)अमीर-उल-मोमिनीन (आजीवन)
कानूननागरिक और शरिया का मिश्रणकेवल कठोर शरिया
महिला अधिकारशिक्षा/रोज़गार का अधिकार (संवैधानिक)लगभग पूर्ण प्रतिबंध (Gender Apartheid)
मीडियास्वतंत्र और जीवंतभारी सेंसरशिप और राज्य नियंत्रण
झंडातिरंगा (काला, लाल, हरा)सफेद झंडा (शहादा के साथ)

आर्थिक स्थिति, संसाधन एवं मानवीय संकट

1. जीडीपी का पतन: एक झटके में बर्बादी

तालिबान के सत्ता में आने (अगस्त 2021) के बाद अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था को जो झटका लगा, वह किसी भी आधुनिक देश के लिए अभूतपूर्व था।

  • अर्थव्यवस्था का संकुचन: 2021-2022 में अर्थव्यवस्था लगभग 25-30% सिकुड़ गई। यह वैसा ही है जैसे किसी देश की एक चौथाई आय रातों-रात गायब हो जाए।
  • प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income): 2012 में जो आय $600 थी, वह 2024 में गिरकर $350 से भी कम हो गई है। अफ़ग़ानिस्तान अब दुनिया का सबसे गरीब देश बन चुका है।
  • विदेशी सहायता का ‘शून्य’ होना: 2020 तक, अफ़ग़ानिस्तान के कुल सार्वजनिक खर्च (Public Spending) का 75% विदेशी अनुदान से आता था (लगभग $8 बिलियन सालाना)। यह मदद रातों-रात $0 हो गई।

2. बैंकिंग संकट: नकद का अकाल

  • ज़ब्त संपत्ति (Frozen Assets): अमेरिका और यूरोपीय बैंकों ने अफ़ग़ानिस्तान केंद्रीय बैंक (Da Afghanistan Bank) के लगभग $9 बिलियन (लगभग 75,000 करोड़ रुपये) ज़ब्त कर लिए हैं।
  • तरलता संकट (Liquidity Crisis): देश में डॉलर और अफ़ग़ानी मुद्रा की भारी कमी है। बैंक सीमित निकासी की अनुमति देते हैं। व्यापार के लिए ‘Letter of Credit’ जारी करना असंभव हो गया है।

3. मानवीय संकट की ‘कीमत’ (Cost of Living)

आम आदमी के लिए जीवन की लागत आसमान छू रही है, जबकि कमाई खत्म हो गई है।

संकेतकलागत/आंकड़ा (2024-25 अनुमान)
गरीबी रेखा90% से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे है (प्रति दिन $2 से कम आय)।
खाद्य सुरक्षा1.5 करोड़ लोग (आबादी का 1/3) यह नहीं जानते कि उनका अगला भोजन कहाँ से आएगा।
महंगाई (Inflation)बुनियादी खाद्य पदार्थों (गेहूँ, तेल, चीनी) की कीमतें 2021 के मुकाबले 30-50% अधिक हैं।
महिला प्रतिबंध की कीमतUN का अनुमान है कि महिलाओं को काम से रोकने से अफ़ग़ानिस्तान को सालाना $1 बिलियन (8300 करोड़ रुपये) का नुकसान हो रहा है।

4. संसाधन: ‘ट्रिलियन डॉलर’ का अवसर जो ज़मीन में गड़ा है

यह अफ़ग़ानिस्तान की सबसे बड़ी विडंबना (Irony) है। यह गरीब देश “सोने के कटोरे” पर बैठा भीख मांग रहा है।

  • कुल अनुमानित मूल्य: अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान के पास $1 ट्रिलियन (लगभग 83 लाख करोड़ रुपये) से अधिक के खनिज भंडार हैं।
  • प्रमुख ‘एसेट्स’ (Assets):
    • लिथियम (Lithium): इसे ‘सफेद सोना’ कहा जाता है (बैटरी के लिए ज़रूरी)। दावा है कि यहाँ बोलीविया जितने भंडार हो सकते हैं।
    • तांबा (Copper): ‘मेस ऐनक’ (Mes Aynak) में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तांबा भंडार है। (मूल्य: ~$50 बिलियन)।
    • लौह अयस्क (Iron Ore): हाजीगाक खदान (मूल्य: ~$400 बिलियन)।
    • दुर्लभ मृदा तत्व (Rare Earths): लैंथेनम, सेरियम, नियोडिमियम।

लागत (Opportunity Cost): बुनियादी ढांचा (रेलवे, बिजली, पानी) न होने और सुरक्षा के डर से कोई भी बड़ी कंपनी (चीन को छोड़कर) निवेश नहीं कर रही है। चीन भी अभी केवल ‘देख रहा है’ (Wait and Watch), खुदाई शुरू नहीं की है। यह संपत्ति ‘Dead Capital’ (मृत पूंजी) बनी हुई है।

5. अफीम बनाम मेथमफेटामाइन (The Drug Economy)

अफ़ग़ानिस्तान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा नशीले पदार्थों पर निर्भर था।

  • अफीम प्रतिबंध का असर: 2022-23 में तालिबान ने अफीम (Poppy) की खेती पर सख्ती से प्रतिबंध लगाया। अफीम का उत्पादन 95% गिर गया।
  • किसानों को नुकसान: इससे अफ़ग़ान किसानों को सालाना $1.3 बिलियन की आय का नुकसान हुआ है। तालिबान ने इसका कोई विकल्प (Alternative Livelihood) नहीं दिया।
  • नया ट्रेंड: अब किसान ‘एफेड्रा’ (Ephedra) पौधे से मेथमफेटामाइन (Meth / Crystal) बना रहे हैं, जो एक सस्ता और खतरनाक नशा है। यह एक नई और सस्ती ड्रग इकोनॉमी को जन्म दे रहा है।

निष्कर्ष: घाटे का सौदा

अफ़ग़ानिस्तान की वर्तमान आर्थिक स्थिति को संक्षेप में ऐसे समझा जा सकता है:

  1. आय (Revenue): सीमा शुल्क (Customs) और कोयला निर्यात से सीमित आय (लगभग $2 बिलियन सालाना)।
  2. खर्च (Expenditure): सुरक्षा बलों और सरकारी वेतन पर खर्च। विकास कार्यों के लिए शून्य बजट।
  3. घाटा (Deficit): मानवीय सहायता (Humanitarian Aid) से भरा जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र हर साल $3-4 बिलियन की अपील करता है, लेकिन अब दुनिया की रुचि कम हो रही है (Donor Fatigue)।

सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना: एक जटिल ‘मोज़ेक’

अफ़ग़ानिस्तान कोई ‘राष्ट्र-राज्य’ (Nation-State) नहीं है जैसा कि हम पश्चिम या आधुनिक भारत में समझते हैं। यह विभिन्न जातियों, भाषाओं और कबीलों का एक संग्रह है, जो इस्लाम और भूगोल के धागे से एक साथ बंधा हुआ है।

1. जातीय मोज़ेक (Ethnic Composition)

अफ़ग़ानिस्तान की जनसंख्या का कोई भी एक समूह बहुमत (50%+) नहीं है, जो सत्ता के लिए निरंतर संघर्ष का एक बड़ा कारण है।

  • पश्तून (42% – 50%): सबसे बड़ा और ऐतिहासिक रूप से शासक समूह। वे मुख्य रूप से दक्षिण और पूर्व में रहते हैं। तालिबान आंदोलन मुख्य रूप से पश्तून राष्ट्रवाद और इस्लामी कट्टरपंथ का मिश्रण है।
  • ताजिक (27%): दूसरा सबसे बड़ा समूह। वे फारसी (दारी) बोलते हैं और मुख्य रूप से उत्तर और पश्चिम में रहते हैं। वे ऐतिहासिक रूप से नौकरशाही, व्यापार और संस्कृति में हावी रहे हैं (अहमद शाह मसूद इसी समुदाय से थे)।
  • हज़ारा (9% – 10%): शिया मुस्लिम समुदाय, जो मुख्य रूप से मध्य अफ़ग़ानिस्तान (हज़ाराजात) के पहाड़ों में रहते हैं। मंगोलियन नैन-नक्श के कारण उन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है और ऐतिहासिक रूप से उन्हें सबसे अधिक भेदभाव और नरसंहार का सामना करना पड़ा है।
  • उज़बेक (9%): तुर्की मूल के लोग, जो उत्तरी सीमा पर रहते हैं।
  • अन्य: बलूच, तुर्कमेन, नूरिस्तानी।

2. सामाजिक इकाई: ‘कौम’ और वफादारी (The Concept of Qawm)

अफ़ग़ानी समाज की मूल इकाई ‘व्यक्ति’ नहीं, बल्कि ‘कौम’ (Qawm) है। ‘कौम’ का अर्थ परिवार, गाँव, कबीला या जनजाति हो सकता है।

  • वफादारी का पदानुक्रम: एक अफ़ग़ान की वफादारी इस क्रम में होती है:
    1. खुद और नज़दीकी परिवार
    2. गाँव/कबीला (Khel)
    3. जातीय समूह (Ethnicity)
    4. धर्म (इस्लाम)
    5. राष्ट्र (अफ़ग़ानिस्तान) – यह अक्सर सबसे अंत में आता है।

यही कारण है कि केंद्रीय सरकारें अक्सर विफल हो जाती हैं; लोग काबुल के आदेशों की तुलना में अपने स्थानीय कबीलाई सरदार (Khan) या मौलवी की बात अधिक मानते हैं।

3. पश्तूनवली: सम्मान की संहिता (Code of Honor)

देश के आधे हिस्से (पश्तूनों) के लिए, जीवन शरिया कानून और ‘पश्तूनवली’ (Pashtunwali) के मिश्रण से चलता है। यह एक प्राचीन, अलिखित आचार संहिता है। इसके प्रमुख स्तंभ हैं:

  1. मेलमस्तिया (Melmastia – आतिथ्य): दुश्मन को भी अगर वह आपके घर आ जाए, तो उसकी रक्षा करना और सत्कार करना।
  2. बदल (Badal – बदला): न्याय का रूप। यदि किसी ने आपका अपमान किया है या खून बहाया है, तो बदला लेना अनिवार्य है, चाहे उसमें पीढ़ियाँ लग जाएँ।
  3. नानावताई (Nanawatai – शरण): किसी भी भगोड़े या ज़रूरतमंद को शरण देना, चाहे वह कानून की नज़र में अपराधी ही क्यों न हो। (यही कारण था कि तालिबान ने ओसामा बिन लादेन को अमेरिका को सौंपने से इनकार कर दिया था – यह उनकी संस्कृति के खिलाफ था)।
  4. तोर (Tor – सम्मान): विशेष रूप से महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा।

4. धर्म और समाज (Religion as the Binder)

इस्लाम (सुन्नी हनफ़ी और शिया जाफ़री) अफ़ग़ानी पहचान का सबसे मज़बूत हिस्सा है।

  • गाँव का मुल्ला: ग्रामीण क्षेत्रों में, मुल्ला (धार्मिक नेता) केवल नमाज़ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं है; वह न्यायाधीश, शिक्षक और सामुदायिक नेता है। सोवियत युद्ध के दौरान, मुल्लाओं ने ही ‘जिहाद’ का नेतृत्व किया, जिससे उनकी शक्ति और बढ़ गई।
  • सूफीवाद बनाम वहाबीवाद: ऐतिहासिक रूप से अफ़ग़ानिस्तान सूफी इस्लाम (नरमपंथी, दरगाहों को मानने वाला) का केंद्र था। लेकिन पिछले 40 वर्षों के युद्ध और विदेशी पैसे (सऊदी अरब) ने कट्टरपंथी ‘सलाफी/वहाबी’ विचारधारा को बढ़ावा दिया है, जो तालिबान की विचारधारा का आधार है।

5. परिवार और लैंगिक संरचना (Family & Gender)

समाज पूरी तरह से पितृसत्तात्मक (Patriarchal) है।

  • संयुक्त परिवार: परिवार बहुत बड़े होते हैं और सुरक्षा जाल (Social Safety Net) का काम करते हैं।
  • विवाह: अरेंज मैरिज सामान्य है, अक्सर कबीले के भीतर (cousin marriage) ताकि ज़मीन और वफादारी परिवार के भीतर ही रहे।
  • महिलाओं की स्थिति: पारंपरिक समाज में, महिला को घर के भीतर (Chador aur Char diwari – परदा और चारदीवारी) सीमित रखा जाता है। शहर (काबुल) और गाँव के बीच इसमें बहुत अंतर था, लेकिन अब तालिबान के शासन में पूरे देश में ग्रामीण रूढ़िवादी नियम लागू कर दिए गए हैं।

6. शहरी बनाम ग्रामीण खाई (The Great Divide)

अफ़ग़ानिस्तान वास्तव में ‘दो देश’ है:

  1. काबुल और बड़े शहर: जहाँ लोग शिक्षित थे, पश्चिमी कपड़े पहनते थे, संगीत सुनते थे और महिलाएँ काम करती थीं।
  2. ग्रामीण अफ़ग़ानिस्तान: जहाँ बिजली नहीं है, साक्षरता 10% से कम है, और जीवन 100 साल पहले जैसा है।

सांस्कृतिक संघर्ष: पिछले 20 वर्षों में अमेरिका समर्थित सरकार ‘शहरी मूल्यों’ का प्रतिनिधित्व करती थी, जिसे ग्रामीण लोग ‘विदेशी’ और ‘अश्लील’ मानते थे। तालिबान की जीत वास्तव में ‘ग्रामीण, रूढ़िवादी अफ़ग़ानिस्तान’ की ‘शहरी, आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान’ पर जीत है।

7. खेल और मनोरंजन: बुज़कशी (Buzkashi)

अफ़ग़ानिस्तान का राष्ट्रीय खेल बुज़कशी उसकी राजनीति का सबसे सटीक रूपक (Metaphor) है।

  • इसमें घुड़सवारों की दो टीमें एक सिर कटे बकरे (या बछड़े) के शव को उठाने और एक गोले (Circle of Justice) में डालने के लिए हिंसक रूप से प्रतिस्पर्धा करती हैं।
  • इसमें कोई निश्चित नियम नहीं होते, केवल ताकत, रणनीति और घोड़ों की शक्ति मायने रखती है। यह अफ़ग़ानी राजनीति की तरह है – क्रूर, अराजक और ताकतवर की जीत।

भारत-अफ़ग़ानिस्तान संबंध: विशेष महत्व एवं वर्तमान स्थिति (2024-2025)

1. भारत के लिए अफ़ग़ानिस्तान का विशेष महत्व क्यों?

भू-राजनीति (Geopolitics) के नक्शे पर अफ़ग़ानिस्तान भारत के लिए तीन कारणों से अनिवार्य है:

क. सुरक्षा और आतंकवाद (National Security)

  • कश्मीर लिंक: भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अफ़ग़ानिस्तान की धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी आतंकी समूहों (जैसे लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद) के लिए “लांच पैड” के रूप में न हो।
  • ISKP का खतरा: इस्लामिक स्टेट खुरासान (ISKP) भारत को सीधे धमकी देता है। भारत चाहता है कि अफ़ग़ानिस्तान में कोई ऐसी सत्ता हो जो इन तत्वों को नियंत्रित कर सके।

ख. पाकिस्तान को घेरना (Strategic Encirclement)

  • पाकिस्तान हमेशा अफ़ग़ानिस्तान को अपनी “रणनीतिक गहराई” (Strategic Depth) मानता आया है — यानी युद्ध की स्थिति में अपनी सेना और हथियारों को छिपाने की जगह। भारत का अफ़ग़ानिस्तान में प्रभाव पाकिस्तान की इस रणनीति को काटता है। एक स्वतंत्र और भारत-समर्थक अफ़ग़ानिस्तान पाकिस्तान के लिए दो-मोर्चे की चुनौती (Two-front challenge) खड़ा करता है।

ग. मध्य एशिया का प्रवेश द्वार (Gateway to Central Asia)

  • पाकिस्तान भारत को ज़मीनी रास्ता नहीं देता। इसलिए, अफ़ग़ानिस्तान ही वह एकमात्र रास्ता है जिसके ज़रिए भारत मध्य एशिया (तेल और गैस समृद्ध क्षेत्र) तक पहुँच सकता है।
  • चाबहार बंदरगाह: ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत की इस रणनीति की धुरी है, जो अफ़ग़ानिस्तान के डेलाराम-ज़ारंज हाईवे से जुड़ता है।

2. ‘सॉफ्ट पावर’ की विरासत (2001-2021)

तालिबान के लौटने से पहले, भारत अफ़ग़ानिस्तान का सबसे बड़ा क्षेत्रीय दाता (Regional Donor) था। भारत ने वहाँ बंदूकें नहीं, बल्कि स्कूल और बांध भेजे।

  • कुल निवेश: ~3 बिलियन डॉलर (लगभग 25,000 करोड़ रुपये)।
  • प्रमुख परियोजनाएँ (Iconic Projects):
    • अफ़ग़ान संसद भवन: काबुल में लोकतंत्र का प्रतीक (जिसे भारत ने बनाया)।
    • सलमा बांध (Afghan-India Friendship Dam): हेरात में बिजली और सिंचाई के लिए।
    • ज़ारंज-डेलाराम हाईवे: ईरान सीमा को जोड़ने वाली सड़क।
    • शहतूत बांध (Shahtoot Dam): काबुल में पीने के पानी के लिए (प्रस्तावित, अब रुका हुआ)।
  • मानवीय संबंध: हज़ारों अफ़ग़ान छात्र भारतीय छात्रवृत्ति (ICCR) पर भारत में पढ़ते थे और मरीज़ इलाज के लिए दिल्ली आते थे। अफ़ग़ान लोगों के दिल में भारत के लिए जो जगह है (Goodwill), वह पाकिस्तान के पास कभी नहीं रही।

3. वर्तमान संबंध (2021 के बाद): “व्यावहारिक जुड़ाव” (Pragmatic Engagement)

15 अगस्त 2021 को जब तालिबान काबुल में घुसा, तो भारत ने अपना दूतावास बंद कर दिया। लेकिन एक साल के भीतर, भारत ने अपनी नीति में ‘यू-टर्न’ नहीं, बल्कि ‘सुधार’ किया।

वर्तमान नीति का नाम है: “संलग्नता बिना मान्यता” (Engagement without Recognition).

क. काबुल में वापसी (Technical Team)

  • जून 2022 में, भारत ने काबुल में अपना दूतावास फिर से खोला, लेकिन एक राजदूत के साथ नहीं, बल्कि एक “तकनीकी टीम” (Technical Team) के साथ।
  • इसका उद्देश्य: मानवीय सहायता का वितरण देखना और तालिबान के साथ सीमित संपर्क रखना।

ख. मानवीय सहायता कूटनीति (Humanitarian Aid Diplomacy)

भारत ने अफ़ग़ान जनता को अकेला नहीं छोड़ा।

  • गेहूँ: भारत ने वाघा बॉर्डर के रास्ते (पाकिस्तान से विशेष अनुमति लेकर) 50,000 मीट्रिक टन गेहूँ भेजा।
  • भूकंप राहत: 2022 और 2023 के भूकंपों के बाद भारत ने सबसे पहले राहत सामग्री भेजी।
  • दवाइयाँ: काबुल के इंदिरा गांधी चिल्ड्रेन हॉस्पिटल को टनों दवाइयाँ और कोविड वैक्सीन दी गईं।

ग. तालिबान का रुख (Taliban 2.0’s Stance towards India)

हैरानी की बात यह है कि तालिबान 2.0 भारत के प्रति सकारात्मक संकेत दे रहा है।

  • कारण: तालिबान पाकिस्तान पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। वे जानते हैं कि पाकिस्तान आर्थिक रूप से कंगाल है, जबकि भारत निवेश और बुनियादी ढाँचा दे सकता है।
  • रक्षा मंत्री मुल्ला याकूब का बयान: उन्होंने कहा है कि वे भारत के साथ अच्छे संबंध चाहते हैं और अफ़ग़ान सेना को प्रशिक्षण देने के लिए भी तैयार हैं (भविष्य में)।
  • तालिबान ने भारतीय दूतावास की सुरक्षा का वादा किया है और अब तक उसे निभाया है।

4. प्रमुख चुनौतियाँ और खतरे (Current Challenges)

रिश्ते सुधर रहे हैं, लेकिन बर्फ की पतली परत पर चल रहे हैं।

  1. आतंकवादी समूह: लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के शिविर अभी भी पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान (कुनार, नंगरहार) में मौजूद हैं। क्या तालिबान उन्हें रोकेगा? यह सबसे बड़ा सवाल है।
  2. हक्कानी नेटवर्क: वर्तमान अफ़ग़ान गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी पाकिस्तान की ISI के बेहद करीब है और ऐतिहासिक रूप से भारतीय दूतावास पर हमलों (2008, 2009) के लिए जिम्मेदार रहा है। यह विश्वास की सबसे बड़ी खाई है।
  3. चीन फैक्टर: चीन अफ़ग़ानिस्तान के खनिज संसाधनों पर नज़र गड़ाए हुए है और काबुल में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। भारत नहीं चाहेगा कि अफ़ग़ानिस्तान चीन-पाकिस्तान धुरी (Axis) का हिस्सा बन जाए।

5. अफ़ग़ान छात्रों और वीज़ा का मुद्दा

यह वर्तमान संबंधों का सबसे दुखद पहलू है।

  • हज़ारों अफ़ग़ान छात्र जो भारत में पढ़ रहे थे और 2021 में घर गए थे, वे वापस नहीं आ सके क्योंकि भारत ने सभी पुराने वीज़ा रद्द कर दिए।
  • भारत ने ई-वीज़ा (e-Visa) प्रणाली शुरू की है, लेकिन सुरक्षा कारणों से अफ़ग़ान नागरिकों को बहुत कम वीज़ा जारी किए जा रहे हैं। इससे अफ़ग़ान युवाओं में निराशा है जो भारत को अपना दूसरा घर मानते थे।

निष्कर्ष: भविष्य की रणनीति

भारत की वर्तमान रणनीति “रुको और देखो” (Wait and Watch) की है।

  • भारत तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता देने की जल्दी में नहीं है (दुनिया के किसी देश ने नहीं दी है)।
  • लेकिन, भारत अफ़ग़ानिस्तान में ‘शून्य उपस्थिति’ (Zero Presence) का जोखिम भी नहीं उठा सकता, क्योंकि खाली जगह को तुरंत पाकिस्तान और चीन भर देंगे।
  • इसलिए, भारत धीरे-धीरे मानवीय सहायता और छोटे विकास परियोजनाओं के माध्यम से अपना प्रभाव (Influence) वापस बना रहा है, यह सुनिश्चित करते हुए कि उसकी सुरक्षा से समझौता न हो।

अंतर्राष्ट्रीय संबंध एवं भू-राजनीतिक गतिकी

1. भारत के लिए अफ़ग़ानिस्तान का विशेष महत्व क्यों?

भू-राजनीति (Geopolitics) के नक्शे पर अफ़ग़ानिस्तान भारत के लिए तीन कारणों से अनिवार्य है:

क. सुरक्षा और आतंकवाद (National Security)

  • कश्मीर लिंक: भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अफ़ग़ानिस्तान की धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी आतंकी समूहों (जैसे लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद) के लिए “लांच पैड” के रूप में न हो।
  • ISKP का खतरा: इस्लामिक स्टेट खुरासान (ISKP) भारत को सीधे धमकी देता है। भारत चाहता है कि अफ़ग़ानिस्तान में कोई ऐसी सत्ता हो जो इन तत्वों को नियंत्रित कर सके।

ख. पाकिस्तान को घेरना (Strategic Encirclement)

  • पाकिस्तान हमेशा अफ़ग़ानिस्तान को अपनी “रणनीतिक गहराई” (Strategic Depth) मानता आया है — यानी युद्ध की स्थिति में अपनी सेना और हथियारों को छिपाने की जगह। भारत का अफ़ग़ानिस्तान में प्रभाव पाकिस्तान की इस रणनीति को काटता है। एक स्वतंत्र और भारत-समर्थक अफ़ग़ानिस्तान पाकिस्तान के लिए दो-मोर्चे की चुनौती (Two-front challenge) खड़ा करता है।

ग. मध्य एशिया का प्रवेश द्वार (Gateway to Central Asia)

  • पाकिस्तान भारत को ज़मीनी रास्ता नहीं देता। इसलिए, अफ़ग़ानिस्तान ही वह एकमात्र रास्ता है जिसके ज़रिए भारत मध्य एशिया (तेल और गैस समृद्ध क्षेत्र) तक पहुँच सकता है।
  • चाबहार बंदरगाह: ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत की इस रणनीति की धुरी है, जो अफ़ग़ानिस्तान के डेलाराम-ज़ारंज हाईवे से जुड़ता है।

2. ‘सॉफ्ट पावर’ की विरासत (2001-2021)

तालिबान के लौटने से पहले, भारत अफ़ग़ानिस्तान का सबसे बड़ा क्षेत्रीय दाता (Regional Donor) था। भारत ने वहाँ बंदूकें नहीं, बल्कि स्कूल और बांध भेजे।

  • कुल निवेश: ~3 बिलियन डॉलर (लगभग 25,000 करोड़ रुपये)।
  • प्रमुख परियोजनाएँ (Iconic Projects):
    • अफ़ग़ान संसद भवन: काबुल में लोकतंत्र का प्रतीक (जिसे भारत ने बनाया)।
    • सलमा बांध (Afghan-India Friendship Dam): हेरात में बिजली और सिंचाई के लिए।
    • ज़ारंज-डेलाराम हाईवे: ईरान सीमा को जोड़ने वाली सड़क।
    • शहतूत बांध (Shahtoot Dam): काबुल में पीने के पानी के लिए (प्रस्तावित, अब रुका हुआ)।
  • मानवीय संबंध: हज़ारों अफ़ग़ान छात्र भारतीय छात्रवृत्ति (ICCR) पर भारत में पढ़ते थे और मरीज़ इलाज के लिए दिल्ली आते थे। अफ़ग़ान लोगों के दिल में भारत के लिए जो जगह है (Goodwill), वह पाकिस्तान के पास कभी नहीं रही।

3. वर्तमान संबंध (2021 के बाद): “व्यावहारिक जुड़ाव” (Pragmatic Engagement)

15 अगस्त 2021 को जब तालिबान काबुल में घुसा, तो भारत ने अपना दूतावास बंद कर दिया। लेकिन एक साल के भीतर, भारत ने अपनी नीति में ‘यू-टर्न’ नहीं, बल्कि ‘सुधार’ किया।

वर्तमान नीति का नाम है: “संलग्नता बिना मान्यता” (Engagement without Recognition).

क. काबुल में वापसी (Technical Team)

  • जून 2022 में, भारत ने काबुल में अपना दूतावास फिर से खोला, लेकिन एक राजदूत के साथ नहीं, बल्कि एक “तकनीकी टीम” (Technical Team) के साथ।
  • इसका उद्देश्य: मानवीय सहायता का वितरण देखना और तालिबान के साथ सीमित संपर्क रखना।

ख. मानवीय सहायता कूटनीति (Humanitarian Aid Diplomacy)

भारत ने अफ़ग़ान जनता को अकेला नहीं छोड़ा।

  • गेहूँ: भारत ने वाघा बॉर्डर के रास्ते (पाकिस्तान से विशेष अनुमति लेकर) 50,000 मीट्रिक टन गेहूँ भेजा।
  • भूकंप राहत: 2022 और 2023 के भूकंपों के बाद भारत ने सबसे पहले राहत सामग्री भेजी।
  • दवाइयाँ: काबुल के इंदिरा गांधी चिल्ड्रेन हॉस्पिटल को टनों दवाइयाँ और कोविड वैक्सीन दी गईं।

ग. तालिबान का रुख (Taliban 2.0’s Stance towards India)

हैरानी की बात यह है कि तालिबान 2.0 भारत के प्रति सकारात्मक संकेत दे रहा है।

  • कारण: तालिबान पाकिस्तान पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। वे जानते हैं कि पाकिस्तान आर्थिक रूप से कंगाल है, जबकि भारत निवेश और बुनियादी ढाँचा दे सकता है।
  • रक्षा मंत्री मुल्ला याकूब का बयान: उन्होंने कहा है कि वे भारत के साथ अच्छे संबंध चाहते हैं और अफ़ग़ान सेना को प्रशिक्षण देने के लिए भी तैयार हैं (भविष्य में)।
  • तालिबान ने भारतीय दूतावास की सुरक्षा का वादा किया है और अब तक उसे निभाया है।

4. प्रमुख चुनौतियाँ और खतरे (Current Challenges)

रिश्ते सुधर रहे हैं, लेकिन बर्फ की पतली परत पर चल रहे हैं।

  1. आतंकवादी समूह: लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के शिविर अभी भी पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान (कुनार, नंगरहार) में मौजूद हैं। क्या तालिबान उन्हें रोकेगा? यह सबसे बड़ा सवाल है।
  2. हक्कानी नेटवर्क: वर्तमान अफ़ग़ान गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी पाकिस्तान की ISI के बेहद करीब है और ऐतिहासिक रूप से भारतीय दूतावास पर हमलों (2008, 2009) के लिए जिम्मेदार रहा है। यह विश्वास की सबसे बड़ी खाई है।
  3. चीन फैक्टर: चीन अफ़ग़ानिस्तान के खनिज संसाधनों पर नज़र गड़ाए हुए है और काबुल में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। भारत नहीं चाहेगा कि अफ़ग़ानिस्तान चीन-पाकिस्तान धुरी (Axis) का हिस्सा बन जाए।

5. अफ़ग़ान छात्रों और वीज़ा का मुद्दा

यह वर्तमान संबंधों का सबसे दुखद पहलू है।

  • हज़ारों अफ़ग़ान छात्र जो भारत में पढ़ रहे थे और 2021 में घर गए थे, वे वापस नहीं आ सके क्योंकि भारत ने सभी पुराने वीज़ा रद्द कर दिए।
  • भारत ने ई-वीज़ा (e-Visa) प्रणाली शुरू की है, लेकिन सुरक्षा कारणों से अफ़ग़ान नागरिकों को बहुत कम वीज़ा जारी किए जा रहे हैं। इससे अफ़ग़ान युवाओं में निराशा है जो भारत को अपना दूसरा घर मानते थे।

निष्कर्ष: भविष्य की रणनीति

भारत की वर्तमान रणनीति “रुको और देखो” (Wait and Watch) की है।

  • भारत तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता देने की जल्दी में नहीं है (दुनिया के किसी देश ने नहीं दी है)।
  • लेकिन, भारत अफ़ग़ानिस्तान में ‘शून्य उपस्थिति’ (Zero Presence) का जोखिम भी नहीं उठा सकता, क्योंकि खाली जगह को तुरंत पाकिस्तान और चीन भर देंगे।
  • इसलिए, भारत धीरे-धीरे मानवीय सहायता और छोटे विकास परियोजनाओं के माध्यम से अपना प्रभाव (Influence) वापस बना रहा है, यह सुनिश्चित करते हुए कि उसकी सुरक्षा से समझौता न हो।

अंतर्राष्ट्रीय संबंध एवं भू-राजनीतिक गतिकी: एक नया ‘ग्रेट गेम’

वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य को “पूर्व बनाम पश्चिम” (East vs. West) के विभाजन में देखा जा सकता है। जहाँ पश्चिमी देश प्रतिबंध लगा रहे हैं, वहीं क्षेत्रीय शक्तियाँ (चीन, रूस, ईरान) रिक्त स्थान को भरने के लिए आगे आ रही हैं।

1. कूटनीतिक स्थिति: “मान्यता” का संकट (The Recognition Dilemma)

2026 की शुरुआत तक, संयुक्त राष्ट्र के किसी भी सदस्य देश ने औपचारिक रूप से (De Jure) तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है। फिर भी, व्यावहारिक मान्यता (De Facto Recognition) बढ़ रही है।

  • दोहरी नीति: दुनिया के लगभग 15-20 देशों (जिनमें चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान, तुर्की, कतर और भारत शामिल हैं) ने काबुल में अपने दूतावास खुले रखे हैं।
  • चीन का साहसिक कदम: चीन पहला प्रमुख देश था जिसने औपचारिक रूप से तालिबान राजदूत के परिचय पत्र (Credentials) स्वीकार किए। यह पूर्ण मान्यता से बस एक कदम पीछे है।
  • पश्चिम का रुख: अमेरिका और यूरोपीय संघ ने अपनी उपस्थिति ‘दोहा’ (कतर) में स्थानांतरित कर दी है। वे तालिबान से बात करते हैं, लेकिन केवल आतंकवाद और मानवीय सहायता के मुद्दों पर।

2. क्षेत्रीय पड़ोसी: मित्र या शत्रु?

अफ़ग़ानिस्तान के अपने पड़ोसियों के साथ संबंध सबसे जटिल और अस्थिर हैं।

क. पाकिस्तान: ‘साँप को दूध पिलाना’

  • रिश्तों में खटास: पाकिस्तान, जो कभी तालिबान का सबसे बड़ा समर्थक था, अब सबसे बड़ा पीड़ित है। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की जीत ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) का हौसला बढ़ाया है, जो पाकिस्तान के भीतर हमले कर रहा है।
  • डूरंड रेखा विवाद: तालिबान पाकिस्तान द्वारा सीमा पर लगाई गई बाड़ को नहीं मानता। सीमा पर झड़पें अब आम बात हो गई हैं। पाकिस्तान को अब अपनी “रणनीतिक गहराई” की नीति उल्टी पड़ती दिख रही है।

ख. ईरान: जल युद्ध और शिया सुरक्षा

  • हेलमंद नदी जल संधि: ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच सबसे बड़ा तनाव पानी को लेकर है। अफ़ग़ानिस्तान द्वारा बांध (कमल खान बांध) बनाने से ईरान के सिस्तान प्रांत में सूखा पड़ रहा है।
  • व्यापार मार्ग: तनाव के बावजूद, ईरान अफ़ग़ानिस्तान का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। हेरात और पश्चिमी अफ़ग़ानिस्तान आर्थिक रूप से ईरान पर निर्भर हैं।

ग. मध्य एशियाई गणराज्य (उज़बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान)

  • सुरक्षा बफर: ये देश रूस के प्रभाव क्षेत्र में हैं। इनका मुख्य डर यह है कि अफ़ग़ानी कट्टरपंथ उनकी सीमाओं में न घुस जाए।
  • कोश टेपा नहर (Qosh Tepa Canal): यह वर्तमान का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक मुद्दा है। तालिबान उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान में एक विशाल नहर खोद रहा है जो अमु दरिया नदी का पानी मोड़ेगी। इससे उज़बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान (जो कपास की खेती पर निर्भर हैं) में पानी की भारी कमी हो सकती है। यह भविष्य के ‘जल युद्ध’ का कारण बन सकता है।

3. वैश्विक शक्तियाँ: नया शीत युद्ध

क. चीन: आर्थिक अवसरवाद (Economic Pragmatism)

चीन की नीति स्पष्ट है: “राजनीति में हस्तक्षेप नहीं, केवल व्यापार और सुरक्षा।”

  • उद्देश्य: चीन चाहता है कि अफ़ग़ानिस्तान की धरती का इस्तेमाल ‘ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट’ (ETIM – उइगर चरमपंथी) द्वारा न किया जाए।
  • बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI): चीन अफ़ग़ानिस्तान को CPEC (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे) से जोड़ना चाहता है ताकि वह अफ़ग़ान तांबे (मेस ऐनक) और लिथियम का दोहन कर सके।

ख. रूस: सुरक्षा गारंटर

  • रूस को डर है कि अफ़ग़ानिस्तान से निकलने वाला आतंकवाद (विशेषकर ISKP) मध्य एशिया के रास्ते मास्को तक पहुँच सकता है।
  • पुतिन प्रशासन तालिबान के साथ निकट संपर्क में है और उन्हें “आतंकवादी सूची” से हटाने पर विचार कर रहा है ताकि कूटनीतिक संबंध सामान्य हो सकें।

ग. अमेरिका: ‘क्षितिज के पार’ (Over the Horizon)

  • सैन्य वापसी के बाद, अमेरिका की रणनीति “नियंत्रण और निगरानी” की है।
  • अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान की विदेशी संपत्ति ($7-9 बिलियन) ज़ब्त कर रखी है, जिसे वह तालिबान पर दबाव बनाने के लिए एक लीवर (Lever) के रूप में उपयोग करता है। अमेरिका का मुख्य सरोकार अब केवल अल-कायदा और ISKP को दोबारा सिर उठाने से रोकना है।

4. भू-आर्थिक गलियारे (Geo-economic Corridors)

युद्ध समाप्त होने के बाद, अफ़ग़ानिस्तान अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर “एशिया का ट्रांजिट हब” बनना चाहता है, लेकिन सुरक्षा बाधा बनी हुई है।

  1. TAPI पाइपलाइन: (तुर्कमेनिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान-भारत) गैस पाइपलाइन। तालिबान इसे सुरक्षा देने का वादा कर रहा है क्योंकि इससे उन्हें ट्रांजिट शुल्क (Transit Fee) के रूप में लाखों डॉलर मिलेंगे।
  2. ट्रांस-अफ़ग़ान रेलवे: उज़बेकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान ने एक रेलवे लाइन बनाने पर सहमति जताई है जो मध्य एशिया को पाकिस्तान के बंदरगाहों से जोड़ेगी। यदि यह बनती है, तो यह क्षेत्र का भूगोल बदल देगी।

5. आतंकी पारिस्थितिकी तंत्र (Terror Ecosystem)

भू-राजनीति का सबसे काला अध्याय यह है कि अफ़ग़ानिस्तान अभी भी विभिन्न आतंकी समूहों का घर है, जो अलग-अलग देशों के लिए खतरा हैं:

  • अल-कायदा: पश्चिम और अमेरिका के लिए खतरा (तालिबान के संरक्षण में)।
  • TTP: पाकिस्तान के लिए खतरा।
  • ISKP: रूस, ईरान और मध्य एशिया के लिए खतरा (तालिबान का दुश्मन)।
  • Jaish/Lashkar: भारत के लिए खतरा।

निष्कर्ष: एक नाजुक संतुलन

2025-26 में अफ़ग़ानिस्तान की भू-राजनीति एक “असंतुलित बहु-ध्रुवीयता” (Unbalanced Multipolarity) की स्थिति में है।

  • पश्चिम इसे अलग-थलग करना चाहता है।
  • क्षेत्रीय देश इसे एकीकृत करना चाहते हैं (मजबूरी में)।
  • तालिबान इस विभाजन का फायदा उठाकर अपनी सत्ता बनाए रखना चाहता है।

अफ़ग़ानिस्तान एक ऐसा ‘ब्लैक होल’ बन गया है जो अपने पड़ोसियों की ऊर्जा और संसाधनों को निगल रहा है, और जिससे निकलने वाली अस्थिरता की किरणें पूरी दुनिया को प्रभावित कर रही हैं।

निष्कर्ष: भारत और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए नीतिगत निहितार्थ (Policy Implications)

अफ़ग़ानिस्तान आज एक “जटिल यथार्थ” (Complex Reality) बन चुका है। तालिबान का शासन जल्द खत्म होने वाला नहीं है, और अफ़ग़ान जनता का कष्ट भी कम होने वाला नहीं है। ऐसे में, भावुकता के बजाय व्यावहारिक यथार्थवाद (Pragmatic Realism) ही एकमात्र रास्ता है।

1. भारत के लिए नीतिगत रोडमैप (Policy Roadmap for India)

भारत के लिए अफ़ग़ानिस्तान में ‘शून्य उपस्थिति’ (Zero Presence) का विकल्प अब मेज पर नहीं है। यदि भारत पीछे हटता है, तो वह स्थान पाकिस्तान और चीन भर देंगे, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक होगा।

क. “सीमित लेकिन सक्रिय संलग्नता” (Limited but Active Engagement):

  • नीति: भारत को काबुल में अपनी ‘तकनीकी उपस्थिति’ बनाए रखनी चाहिए। इसका उद्देश्य खुफिया जानकारी जुटाना (Intelligence Gathering) और तालिबान के उन गुटों (जैसे मुल्ला याकूब) के साथ चैनल खुले रखना है जो पाकिस्तान से दूरी बनाना चाहते हैं।
  • मान्यता: भारत को औपचारिक मान्यता देने में कोई जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। मान्यता को “आतंकवाद पर कार्रवाई” के साथ जोड़ा जाना चाहिए।

ख. “स्मार्ट पावर” और मानवीय सहायता:

  • भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी ‘सॉफ्ट पावर’ है। भारत को गेहूँ, दवाइयाँ और आपदा राहत भेजना जारी रखना चाहिए। यह सीधे अफ़ग़ान जनता के दिलों से जुड़ता है और तालिबान को भी भारत की उपयोगिता का एहसास कराता है।
  • शिक्षा: भारत को अफ़ग़ान छात्रों के लिए ऑनलाइन शिक्षा या वीज़ा नियमों में ढील (सख्त सुरक्षा जांच के बाद) पर पुनर्विचार करना चाहिए ताकि भविष्य की पीढ़ी (Future Leaders) भारत से जुड़ी रहे।

ग. सुरक्षा और आतंकवाद:

  • लाल रेखा (Red Line): भारत को स्पष्ट करना चाहिए कि लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के अफ़ग़ानिस्तान में प्रशिक्षण शिविर भारत के लिए “अस्वीकार्य” हैं। इसके लिए भारत को रूस और मध्य एशियाई देशों (ताजिकिस्तान/उज़बेकिस्तान) के साथ खुफिया साझाकरण बढ़ाना होगा।

घ. कनेक्टिविटी और चाबहार:

  • चाबहार बंदरगाह परियोजना को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाना चाहिए। यह अफ़ग़ानिस्तान को पाकिस्तान की निर्भरता से मुक्त करने और भारत को मध्य एशिया तक पहुँचाने का एकमात्र रास्ता है।

2. अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए नीतिगत निहितार्थ (For International Community)

पश्चिमी देशों की “प्रतिबंध और अलगाव” (Sanctions and Isolation) की नीति विफल रही है। इससे तालिबान कमजोर नहीं हुआ, बल्कि आम जनता भूखी मर रही है।

क. “शर्तों पर आधारित जुड़ाव” (Conditional Engagement):

  • दुनिया को तालिबान से बात करनी होगी, लेकिन मान्यता को “लीवर” (Lever) की तरह इस्तेमाल करना होगा।
  • सूत्र: “सहायता के बदले मानवाधिकार।” यदि तालिबान लड़कियों के स्कूल खोलता है, तो विदेशी संपत्ति (Frozen Assets) का एक हिस्सा जारी किया जा सकता है।

ख. लैंगिक रंगभेद (Gender Apartheid) को संहिताबद्ध करना:

  • संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं की स्थिति को आधिकारिक तौर पर “लैंगिक रंगभेद” घोषित किया जाना चाहिए। इससे तालिबान पर नैतिक और कानूनी दबाव बना रहेगा और मुस्लिम जगत (OIC) को भी इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाने के लिए मजबूर किया जा सकेगा।

ग. क्षेत्रीय समाधान (Regional Solution):

  • अमेरिका और नाटो के जाने के बाद, अफ़ग़ानिस्तान अब एक “क्षेत्रीय समस्या” है। चीन, रूस, ईरान, पाकिस्तान और भारत को एक साझा मंच (जैसे शंघाई सहयोग संगठन – SCO) के तहत काम करना होगा ताकि अफ़ग़ानिस्तान से आतंकवाद और ड्रग्स का निर्यात रोका जा सके।

घ. जल कूटनीति (Water Diplomacy):

  • कोश टेपा नहर (Qosh Tepa Canal): अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को मध्यस्थता करनी होगी ताकि अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशियाई देशों के बीच आगामी जल युद्ध को रोका जा सके। जलवायु परिवर्तन इस क्षेत्र में अगला बड़ा युद्ध का कारण बन सकता है।

3. अंतिम सारांश: भविष्य के तीन परिदृश्य (Scenarios 2030)

इस अध्ययन का समापन हम भविष्य के तीन संभावित रास्तों के साथ कर सकते हैं:

अंतिम विचार: अफ़ग़ानिस्तान “साम्राज्यों का कब्रिस्तान” रहा है, लेकिन इसे “आशाओं का कब्रिस्तान” नहीं बनने देना चाहिए। भारत और दुनिया के लिए सबसे सुरक्षित नीति यही है कि वे अफ़ग़ान जनता को न छोड़ें, चाहे काबुल की गद्दी पर कोई भी बैठा हो। एक स्थिर अफ़ग़ानिस्तान ही एक सुरक्षित दक्षिण एशिया की गारंटी है।


अफ़ग़ानिस्तान अध्ययन: एक पूर्ण पैकेज

अब आपके पास अफ़ग़ानिस्तान पर एक विस्तृत डोजियर (Dossier) तैयार है:

  1. राजनीतिक: तालिबान 2.0 का ढाँचा
  2. ऐतिहासिक: साम्राज्यों के कब्रिस्तान की कहानी
  3. भूगोल: संसाधन और रणनीतिक स्थिति
  4. सामाजिक: कबीलाई ताना-बाना और महिलाएं
  5. आर्थिक: ट्रिलियन डॉलर के संसाधन बनाम भुखमरी
  6. भारत और दुनिया: भविष्य की नीति
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Subject: General
Difficulty: Moderate
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